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Tuesday, September 22, 2026

40 हजार साल पहले इंसान ने सीख ली थी लिखने की कला?

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नई दिल्ली। अब तक हम किताबों में यही पढ़ते आए हैं कि लिखने की कला यानी राइटिंग की शुरुआत करीब 5,000 साल पहले मेसोपोटामिया की ‘प्रोटो-क्यूनीफॉर्म’ लिपि से हुई थी. लेकिन हाल ही में ‘प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ (PNAS) में पब्लिश हुई एक रिसर्च ने इस दावे को पूरी तरह चुनौती दे दी है. वैज्ञानिकों को जर्मनी की पहाड़ियों में ऐसे सबूत मिले हैं, जो बताते हैं कि इंसान आज से 40,000 साल पहले ही प्रतीकों और निशानों के जरिए अपनी बात दूसरों तक पहुंचाना सीख गया था. यह खोज न केवल पुरानी है, बल्कि यह साबित करती है कि पाषाण युग यानी स्टोन एज का इंसान भी आज के इंसान जितना ही दिमाग वाला था. वह सिर्फ शिकार नहीं करता था, बल्कि जटिल जानकारी को स्टोर करने और शेयर करने के लिए एक खास सिस्टम का इस्तेमाल भी करता था. जर्मनी के स्वाबियन जुरा इलाके में मिली ये कलाकृतियां संचार के इतिहास को पूरी तरह से नए संदर्भ में पेश कर रही हैं।

क्या 40 हजार साल पहले ही शुरू हो गई थी लिखने की कला?

इस रिसर्च की को-ऑथर और बर्लिन के म्यूजियम ऑफ प्रीहिस्ट्री की आर्कियोलॉजिस्ट एवा डुटकीविक्ज़ ने बताया कि ये अवशेष उस दौर के हैं जब होमो सेपियन्स ने अफ्रीका छोड़ा था. वे यूरोप में बस रहे थे और उनका सामना निएंडरथल मानव से हो रहा था. वैज्ञानिकों ने जर्मनी की गुफाओं से मिली करीब 260 ऐसी चीजों का एनालिसिस किया है, जिन पर अजीबोगरीब निशान बने हुए हैं. इनमें हाथी के दांत (मैमथ टस्क) से बनी छोटी मूर्तियां और मशहूर ‘एडोरेंट’ नक्काशी शामिल है. इन सभी पर बार-बार दोहराई गई लाइनें, क्रॉस, डॉट्स और खांचे बने हुए हैं. टीम ने करीब 3,000 से ज्यादा ऐसे ज्यामितीय निशानों को एक डेटाबेस में डाला और कंप्यूटर टूल्स की मदद से उनकी जांच की. हैरानी की बात यह है कि ये निशान कोई रैंडम डिजाइन नहीं थे, बल्कि एक सोचे-समझे पैटर्न का हिस्सा थे।

आदिमानव के ये ‘सीक्रेट कोड’ आखिर क्या इशारा करते हैं?

जर्मनी की सारलैंड यूनिवर्सिटी के भाषाविद् क्रिश्चियन बेंज का कहना है कि उन्होंने इन निशानों को समझने के लिए ‘क्वांटिटेटिव लिंग्विस्टिक्स’ और ‘स्टैटिस्टिकल मॉडलिंग’ जैसे एडवांस तरीकों का इस्तेमाल किया. रिसर्च में यह देखा गया कि क्या इन निशानों में उतनी ही जानकारी छिपी है जितनी बाद में विकसित हुई लिपियों में होती थी. विश्लेषण से पता चला कि इन प्रतीकों में सूचनाओं को कोड करने की क्षमता थी. दिलचस्प बात यह है कि मेसोपोटामिया की शुरुआती राइटिंग और इन 40,000 साल पुराने निशानों में काफी समानताएं देखी गईं. इसका मतलब यह हुआ कि लिखने का तरीका हजारों सालों तक लगभग एक जैसा ही रहा. हालांकि, वैज्ञानिक अभी तक इन संदेशों को पूरी तरह डिकोड नहीं कर पाए हैं, लेकिन वे इस बात को लेकर पूरी तरह कॉन्फिडेंट हैं कि ये निशान किसी बोली जाने वाली भाषा का हिस्सा नहीं थे. जब वैज्ञानिकों ने इन निशानों के पैटर्न को गहराई से देखा, तो उन्हें कुछ खास बातें पता चलीं. इन कलाकृतियों पर एक ही तरह के निशान जैसे ‘क्रॉस-क्रॉस-क्रॉस’ या ‘लाइन-लाइन-लाइन’ बार-बार दोहराए गए थे. बेंज के मुताबिक, इस तरह का रिपिटिशन किसी भी बोली जाने वाली भाषा में नहीं मिलता. इसलिए इसे ‘स्पीच’ यानी बोलने का लिखित रूप नहीं माना जा सकता. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ये बेकार थे. यह एडोरेंट मूर्ति लगभग 38,000 साल पुरानी है. इसमें एक छोटी हाथीदांत की प्लेट है जिस पर एक इंसानी आकृति और कई निशान और डॉट्स बने हैं. इन निशानों का इस्तेमाल एक नोटेशन सिस्टम का सुझाव देता है, खासकर प्लेट के पीछे डॉट्स की लाइनों में. (Credit: Landesmuseum Württemberg / Hendrik Zwietasch) ये निशान एक तरह के ‘इंटरकम्युनिकेशन’ का जरिया थे. रिसर्च में पाया गया कि मूर्तियों पर बने निशानों में सूचना का घनत्व (इन्फॉर्मेशन डेंसिटी) औजारों या गहनों पर बने निशानों के मुकाबले 15 प्रतिशत ज्यादा था. यानी अलग-अलग चीजों पर अलग-अलग तरह की जानकारी कोड की गई थी।

पाषाण युग के इंसान का दिमाग आज के इंसान जैसा ही था?

इस नई खोज ने एक और बड़े सच पर मुहर लगा दी है. वह यह कि दिमागी क्षमता के मामले में पाषाण युग का इंसान आज के इंसान से बिल्कुल भी पीछे नहीं था. उनमें सूचनाओं को स्टोर करने और उन्हें व्यवस्थित करने की वैसी ही क्षमता थी, जैसी आज हमारे पास है. जिस तरह आज हम इमोजी या कंप्यूटर कोडिंग का इस्तेमाल करते हैं, ठीक वैसे ही 40,000 साल पहले का इंसान इन प्रतीकों का इस्तेमाल करता था. एवा डुटकीविक्ज़ कहती हैं कि हमने अभी सिर्फ सतह को खंगाला है, ऐसी कई और सीक्वेंस खोजी जानी बाकी हैं. ये निशान करीब 10,000 सालों तक एक ही पैटर्न में इस्तेमाल होते रहे और फिर अचानक गायब हो गए. यह रहस्य अभी भी बरकरार है कि आखिर ये सिस्टम खत्म क्यों हुआ और मेसोपोटामिया की लिपि इससे कितनी अलग थी।

क्या ये खोज इतिहास की किताबों को बदलने के लिए काफी है?

निश्चित रूप से यह खोज इतिहास को देखने का नजरिया बदल देती है. अब तक माना जाता था कि खेती और स्थाई जीवन शुरू होने के बाद ही लिखने की जरूरत महसूस हुई. लेकिन अब साफ है कि शिकारी और खानाबदोश इंसान भी अपनी यादों या डेटा को सुरक्षित रखने के लिए ‘साइन सिस्टम’ का सहारा लेते थे. हालांकि ये मेसोपोटामिया की लिपि की तरह पूरी भाषा में नहीं बदले, लेकिन इन्होंने आधुनिक संचार की नींव रख दी थी।

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