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Monday, March 23, 2026

क्रिसमस से पहले सूरत में बड़े धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़

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सूरत| क्रिसमस से ठीक पहले सूरत जिला पुलिस ने एक ऐसे बड़े धर्मांतरण घोटाले का पर्दाफाश किया है, जिसने शिक्षा जगत और प्रशासनिक तंत्र में भूचाल ला दिया है। समाज को सही दिशा दिखाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर होती है, वही सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल और शिक्षक आदिवासी इलाकों में ट्रस्ट बनाकर अवैध धर्मांतरण का नेटवर्क चला रहे थे। जांच में सामने आया है कि वर्ष 2014 में ‘द प्रे फॉर एवर लास्टिंग लाइफ चैरिटेबल ट्रस्ट’ की स्थापना की गई थी। इस ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य आदिवासी भाई-बहनों को लालच देकर या भ्रमित कर ईसाई धर्म में परिवर्तित करना था। इस घोटाले का मुख्य सूत्रधार रामजी दुबलभाई चौधरी है, जो स्वयं एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत है। 
चौंकाने वाली बात यह है कि 11 सदस्यों वाले इस ट्रस्ट में 3 सरकारी शिक्षा अधिकारी और 6 पास्टर शामिल थे। इस पूरे नेटवर्क में सबसे हैरान करने वाली भूमिका रामजी चौधरी के पुत्र अंकित चौधरी की थी, जो बीएचएमएस डॉक्टर है। अंकित अवैध रूप से एलोपैथी चिकित्सा कर रहा था। वह गरीब आदिवासी मरीजों को मुफ्त इलाज के बहाने फंसाता था। पुलिस ने उसके पास से रु. 56,000 की कीमत की संदिग्ध दवाइयों का जखीरा जब्त किया है, जिसमें हानिकारक स्टेरॉयड और भारी मात्रा में पेनकिलर इंजेक्शन पाए गए। वह इन दवाओं से मरीजों को तात्कालिक राहत देता और मरीज के ठीक होते ही कहता कि “आपको दवा से नहीं, बल्कि प्रभु यीशु की कृपा से आराम मिला है।” इसके बाद धर्मांतरण की अंतिम प्रक्रिया के लिए मरीजों को अपने पिता रामजी चौधरी के पास भेज दिया जाता था।
सूरत जिला पुलिस के मताबिक इस नेटवर्क की कार्यप्रणाली बेहद संगठित थी। किसी भी धर्मांतरण या प्रार्थना सभा में शामिल लोगों को मोबाइल फोन लाने की सख्त मनाही थी, ताकि कोई वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग न हो और पुलिस को सबूत न मिल सके। इसके अलावा, प्रिंसिपल ने सरकारी नियमों का उल्लंघन करते हुए बिना पूर्व सरकारी अनुमति के ही ट्रस्ट की शुरुआत कर दी थी। 2014 से सक्रिय होने के बावजूद ट्रस्ट का एक बार भी ऑडिट नहीं हुआ, जिससे वित्तीय लेन-देन संदेह के घेरे में है। सूरत ग्रामीण पुलिस ने चैरिटी कमिश्नर से रिपोर्ट मंगवाई है और ट्रस्ट के आर्थिक व्यवहार की जांच शुरू कर दी है। शिक्षा की आड़ में चल रहे इस धर्मांतरण के खेल से आदिवासी संगठनों में भारी आक्रोश है|

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